Friday, 22 May 2009

समर्थन ले लो! समर्थन ले लो!!

''समर्थन ले लो! समर्थन ले लो!!ÓÓ कोई जोर-जोर से चिल्ला रहा था। मोहन बाबू की आंखें खुल गईं। वह सोच में पड़ गए कि न किसी फल का नाम समर्थन है और न ही सब्जी का। समर्थन के नाम से कोई दाल भी नहीं होती। आज तक किसी ठेली वाले को समर्थन बेचते हुए भी नहीं सुना, फिर यह क्या बला है? नींद तो खराब हो गई थी, वह बाहर आ गए।

ठेली वाला विन्रमता से मुस्कराया, ''साहब, समर्थन ले लो।ÓÓमोहन बाबू ने झुंझलाकर कहा, ''समर्थन-समर्थन क्या चिल्ला रहे हो। सुबह-सुबह नींद खराब कर दी।

ÓÓवह और भी विन्रम हो गया, ''लोग तो लालयित रहते हैं समर्थन के लिए और आप मना कर रहे हो?ÓÓउसकी अति विन्रमता को देखकर मोहन बाबू को भी विन्रम का ढोंग करना पड़ा। फिर भी वह टालने के अंदाज में बोले, ''भईया, मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।

ÓÓवह मुस्कराया, ''आपसे कुछ मांगा किसने है? हम तो मुफ्त में समर्थन दे रहे हैं- बिल्कुल फ्री। बिना लोभ-लालच के। हमें कुछ नहीं चाहिए।

ÓÓमोहन बाबू को उसकी बातों में इंट्रेस्ट आने लगा। उन्होंने जिंदगी में पहली बार देखा कि कोई चीज मुफ्त में मिल रही है। अन्यथा कुछ भी देने से पहले उसके दाम लगाए जाते हैं। मोल-भाव किया जाता है। उन्होंने पूछा, ''भईया, यह समर्थन है क्या बला, यह तो बताओ।

ÓÓउसने ठेली की ओर इशारा किया। उस पर दस-पंद्रह लोग बैठे थे। वह बोला, ''यह हमारे जनप्रतिनिधि हैं। ये ही समर्थन हैं। इन्होंने भी मंत्री, निगम के अध्यक्ष या ऐसे ही मलाईदार पद के सपने देखे थे, लेकिन सिर्फ आपकी खातिर इन्हें अब कुछ नहीं चाहिए...कुछ नहीं चाहिए।ÓÓ कहते-कहते उसकी आंखें नम हो गईं।

मोहन बाबू को लगा कि कहीं उनकी आंखों में भी आंसू न आ जाएं इसलिए जल्दी से हाथ जोड़ लिए, ''ठीक हैं भईया, दे-दो समर्थन।

ÓÓवह ऐसे चहका मानो दुनिया की सारी खुशियां उसे मिल गई हों। उसे प्रसन्नता थी कि सबसे पहले उसी ने समर्थन दिया।

मोहन बाबू दरवाजा बंद कर ठीक से बैठ भी नहीं पाए थे कि महिला की आवाज सुनाई दी। वह बदहवास-सी चिल्लाए जा रही थी- समर्थन ले लो! समर्थन ले लो!! समर्थन ले लो!!!

उन्हें दरवाजा खोलना पड़ा।महिला की सांसें तेज-तेज चल रही थीं। उसने सांसों के सम होने का भी इंतजार नहीं किया। वह समर्थन देने की रट लगाए रही।

मोहन बाबू ने समझाने की कोशिश की, ''बहनजी, मुझे समर्थन की कोई जरूरत नहीं है। मुझे बिना किसी मोल-भाव के समर्थन मिल चुका है।

ÓÓइससे उसकी बेचैनी और बढ़ गई। वह दार्शनिक मुद्रा में बोलीं, ''हमने भी प्रधानमंत्री के ख्वाब देखे थे, लेकिन बेदर्द जनता की बेरुखी ने सब गुड़-गोबर कर दिया। जनता ने हमें थोड़ा भी समझा होता तो हम समर्थन दे नहीं, ले रहे होते। और अगर देना भी पड़ता तो अच्छी-खासी कीमत वसूलते। खैर छोड़ो यह सब! बस समर्थन ले लो।

ÓÓमोहन बाबू कुछ कह पाते, इससे पहले ही वह समर्थन देकर चलती बनी। उसने 'हांÓ या 'नाÓ का भी इंतजार नहीं किया।

मोहन बाबू दरवाजा बंद कर मुड़े ही थे कि मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। उधर से कोई रोबदार आवाज सुनाई थी, ''अपन तेरे को समर्थन देता।

ÓÓ''लेकिन आप हैं कौन?ÓÓ मोहन बाबू ने पूछा।उसने मोहन बाबू की बात का जवाब नहीं दिया। वह अपनी रौ में बोला, ''लेकिन-वेकिन छोड़। अपन समर्थन देता तो देता। तेरो को लेना नहीं पड़ेगा।ÓÓ कहकर उसने फोन काट दिया।

मोहन बाबू परेशान हैं- समर्थन देने वालों से। बिन मांग समर्थन दिए जा रहे हैं। अब जैसे ही कोई दरवाजा खटखटाता है या फोन की घंटी बजती है तो मोहन बाबू घबरा जाते हैं- जरूर कोई समर्थन देने वाला ही होगा।

2 comments:

Udan Tashtari said...

ये भी सही है..समर्थन की बाढ़ आ गई है.

RAJNISH PARIHAR said...

समर्थन दे दो से समर्थन ले लो तक का सफ़र बहुत ही जोरदार है...!कितने ही छोटे दल और नेताओं को मन मार कर बैठना पड़ा....क्या करें वे आवाजें लगा रहे है पर कोई समर्थन लेता ही नहीं...