Saturday, 27 June 2009
पर्यावरण बचाओ, जीवन बचाओ
ग्लोबल वार्मिंग काफी हद तक मानव निर्मित समस्या है। पृथ्वी पर कई ऐसे केमिकल कम्पाउंड पाए जाते हैं, जो तापमान को बैलेंस करते हैं। ये ग्रीन हाउस गैसेज कहलाते हैं। ये प्राकृतिक और मानव निर्मित यानी कल-कारखानों से निकले दोनों प्रकार के होते है। ये वाटर वेपर, मिथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि हैं। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पडती हैं, तो इनमें से कुछ किरणें (इंफ्रारेड रेज) वापस लौट जाती हैं। ग्रीन हाउस गैसें इंफ्रारेड रेज को सोख लेती हैं और वातावरण में हीट बढ़ाती हैं। यदि ग्रीन हाउस गैस की मात्रा स्थिर रहती है तो सूर्य से पृथ्वी पर पहुंचने वाली किरणें और पृथ्वी से वापस स्पेस में पहुंचने वाली किरणों में बैलेंस बना रहता है। इससे तापमान भी स्थिर रहता है। मानव द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैस असंतुलन पैदा कर रही हैं। इसका असर पृथ्वी के तापमान पर पड़ रहा है। यही ग्रीन हाउस इफेक्ट कहलाता है।
कल-कारखानों, बिजली उत्पादन आदि में फॉसिल फ्यूल (कोल, पेट्रोलियम) के जलने के कारण कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है। कोयला खदान की खुदाई, तेल की खोज से मिथेन गैस पैदा होती है। इनके साथ ही, नाइट्रोजन फर्टिलाइजर से नाइट्रस ऑक्साइड बनता है। हाइड्रो-फ्लोरोकार्बन, परफ्लोरोकार्बन, सल्फर हेक्सा-फ्लोराइड आदि गैसें आधुनिक कल-कारखानों से निकले कचरे से पैदा होती हैं। ये सब ग्रीनहाउस के स्रोत हैं।
ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव हमारे जीवन तथा आस-पास के वातावरण पर भी पड़ रहा है। समुद्री जलस्तर का बढ़ना, ग्लेशियर का पिघलना, उत्तरी ध्रुवों का सिकुड़ना आदि ग्लोबल वार्मिग के लक्षण हैं। इसके अलावा, मौसम में बदलाव, ऋतुओं में परिवर्तन भी ग्लोबल वार्मिग की वजह से ही हो रहे हैं। इनके अलावा समुद्री तूफान जैसी आपदाएं आएंगी और गर्म वातावरण में पनपने वाले जीवाणु बढ़ेंगे और लोगों में तरह-तरह की बीमारियां फैलेंगी।यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि आगे चलकर खेती ही चैपट हो जाए या इन परिस्थितियों से जूझने के लिए खेती के मौसम, बीजों के चुनाव जैसे दूसरे कामों में आमूल परिवर्तन करना पडे़। उसके पहले भी हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि खाद्य पदार्थों की पैदावार में भारी कमी के कारण भुखमरी फैल जाए।
ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए प्रकृति को बचाना होगा। सौर ऊर्जा का भरपूर उपयोग करना होगा। पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता के लिए विकसित देशों को अंधाधुंध औद्योगीकरण की राह छोड़नी होगी। विश्व में कार्बन विरोधी मुहिम चल रही है। भारत में कोयला व लकड़ी ईधन के बजाए वैकल्पिक ऊर्जा और ईधन के स्त्रोत ढूंढे जाएं। इसका सबसे बेहतर विकल्प सौर ऊर्जा है। इसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए। तटीय इलाकों में पवन ऊर्जा बेहतर विकल्प है। प्राकृतिक और वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों का घरेलू ईधन के तौर पर इस्तेमाल मानवीय स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकारी होगा।
एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग से बड़ी संख्या में लोग एलर्जी का शिकार हो रहे हैं। वल्र्ड एलर्जी आर्गनाइजेशन ‘डब्ल्यूएओ’ के मुताबिक एलर्जी 21वीं सदी की तेजी से उभरती बीमारी के रूप में सामने आ रही है। इससे अस्थम, दमा, और राइनाइटिस, नाक के अंदरूनी हिस्से में जलन, जैसी बीमारियों में भी वृद्धि हो सकती है। एक आकडे़ के अनुसार पूरी दुनिया में हर साल ढाई लाख लोग दमा से मर जाते हैं।
पर्यावरण और जीवन एक सिक्के के दो पहलू हैं। धरती में जीवन तभी बरकरार रहेगा जब पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी लोगों को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे। अधिक से अधिक भूमि पर पौधे लगाकर ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
कुछ प्रयास
अर्थ आर
ग्लोबल वार्मिंग की समस्या की गंभीरता को देखते हुए विश्व के विभिन्न हिस्सों में रह रहे लोगों में जागरूकता आई है। वे इस समस्या से निपटने के लिए अपने-अपने तरीके से हर संभव प्रयास कर रहे हैं। ऐसा ही प्रयास हुआ अर्थ आर के रूप में। सन् 2007 में पहली बार सिडनी के बीस लाख से अधिक लोगों ने एक घंटे के लिए लाइट बंद रखी। इस अभियान हो नाम दिया गया- अर्थ आर -‘मंतजी ीवनत’। सन् 2008 में 35 देशों के करीब एक करोड़ लोगों ने इसमें भाग लिया और इस प्रकार यह अभियान सिडनी से पूरी दुनिया में फैल गया। सन् 2009 में यह अभियान 28 मार्च को मनाया गया। रात साढ़े आठ बजे से लेकर साढ़े नौ बजे तक लाइट बंद रखी गई। इसमें भारत सहित 75 देशों की 1000 शहरों में रहने वाले एक अरब लोगों ने भाग लिया। एक अनुमान के अनुसार यदि एक अरब लोग एक घंटा लाइट बंद रखते हैं तो करीब 60000 मेगावाट बिजली की बचत होती है। उम्मीद है कि आने वाले समय हर देश के नागरिक अभियान में भागेदारी कर महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
मैती- दहेज नहीं पेड लगाओ
आधुनिक विकास के लिए प्राकृति संपदाओं का अंधाधंुध दोहन हुआ है। पहाड़ से पेडों की कटाई भी बड़ी मात्रा में हुई। इससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ा है। इसके दुष्परिणाम ग्लेशियरों के पिघलने आदि के रूप में सामने आ रहे हैं। पर्यावरण की रक्षा के लिए पहाड़ों को हराभरा करना बेहद जरूरी है। इसकी तहत गढ़वाल मंडल में शुरू हुआ मैती नामक रचनात्मक आंदोलन। पेडों की रक्षा के लिए जगह-जगह मैती संगठन बनाए गए हैं। जब किसी लड़की की शादी होती है तो उसके बताए स्थान पर दूल्हा पेड लगाता है। पेड की देखभाल के लिए वह संगठन को कुछ पैसे देता है। यह पैसा गांव के जरूरतमंद लोगों को दे दिया जाता है और वे पेड़ की रक्षा करते हैं। इससे दुल्हन पर्यावरण की रक्षा होती है और दुल्हन का मायके से भावनात्मक संबंध बना रहता है। यदि प्रत्येक शादी में इस परंपरा को अपनाया जाए तो विश्व को पर्यावरण संकट से उबारा जा सकता है।
Saturday, 30 May 2009
सेव ऐवरी drop यानी जीवन के लिए बूंद-बूंद पानी बचाओ
पानी की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके लिए धरना-प्रदर्शन और जाम लगाना तथा आपसी संघर्ष आम बात हो गई है। एक आंकडे़ के अनुसार विश्व के अधिकांश लोगों के लिए पीने का पानी दुर्लभ हो गया है।् हर साल कम से कम 20 करोड़ लोग गंदा पानी पीने की वजह से बीमार पड़ते हैं। इनमें से 20 लाख मर जाते हैं। यह कहा जा रहा हैै कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। यदि हम वक्त रहते नही संभले तो स्थिति यह होगी कि धन-दौलत, सुख-सुविधा सब कुछ होगा, लेकिन पानी के बिना सब बेकार। पीने लायक पानी के स्रोत सीतित हैं। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल पानी का संचयन और अपव्यय है। एक-एक बूंद बचाकर किस तरह लाखों लीटर पानी बचाया जा सकता है, इसकी मिसाल हैं-चर्चित लेखक और कार्टूनिस्ट आबिद सुरती। उन्होंने पानी बचाने के लिए एक अनोखी पहल की है। वह फरवरी, 2007 से एक-एक बूंद पानी की बचाने में लगे हुए हैं। इस अभियान को नाम दिया- ‘सेव एवरी ड्ाप’ और ड्रॉपडेड। उन्होंने अभियान मीरा रोड, मुंबई स्थित अपार्टमेंट्स में शुरू किया। इससे अब तक करीब पांच लाख लीटर पानी बचा चुके हैं।
Friday, 22 May 2009
समर्थन ले लो! समर्थन ले लो!!
''समर्थन ले लो! समर्थन ले लो!!ÓÓ कोई जोर-जोर से चिल्ला रहा था। मोहन बाबू की आंखें खुल गईं। वह सोच में पड़ गए कि न किसी फल का नाम समर्थन है और न ही सब्जी का। समर्थन के नाम से कोई दाल भी नहीं होती। आज तक किसी ठेली वाले को समर्थन बेचते हुए भी नहीं सुना, फिर यह क्या बला है? नींद तो खराब हो गई थी, वह बाहर आ गए।
ठेली वाला विन्रमता से मुस्कराया, ''साहब, समर्थन ले लो।ÓÓमोहन बाबू ने झुंझलाकर कहा, ''समर्थन-समर्थन क्या चिल्ला रहे हो। सुबह-सुबह नींद खराब कर दी।
ÓÓवह और भी विन्रम हो गया, ''लोग तो लालयित रहते हैं समर्थन के लिए और आप मना कर रहे हो?ÓÓउसकी अति विन्रमता को देखकर मोहन बाबू को भी विन्रम का ढोंग करना पड़ा। फिर भी वह टालने के अंदाज में बोले, ''भईया, मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।
ÓÓवह मुस्कराया, ''आपसे कुछ मांगा किसने है? हम तो मुफ्त में समर्थन दे रहे हैं- बिल्कुल फ्री। बिना लोभ-लालच के। हमें कुछ नहीं चाहिए।
ÓÓमोहन बाबू को उसकी बातों में इंट्रेस्ट आने लगा। उन्होंने जिंदगी में पहली बार देखा कि कोई चीज मुफ्त में मिल रही है। अन्यथा कुछ भी देने से पहले उसके दाम लगाए जाते हैं। मोल-भाव किया जाता है। उन्होंने पूछा, ''भईया, यह समर्थन है क्या बला, यह तो बताओ।
ÓÓउसने ठेली की ओर इशारा किया। उस पर दस-पंद्रह लोग बैठे थे। वह बोला, ''यह हमारे जनप्रतिनिधि हैं। ये ही समर्थन हैं। इन्होंने भी मंत्री, निगम के अध्यक्ष या ऐसे ही मलाईदार पद के सपने देखे थे, लेकिन सिर्फ आपकी खातिर इन्हें अब कुछ नहीं चाहिए...कुछ नहीं चाहिए।ÓÓ कहते-कहते उसकी आंखें नम हो गईं।
मोहन बाबू को लगा कि कहीं उनकी आंखों में भी आंसू न आ जाएं इसलिए जल्दी से हाथ जोड़ लिए, ''ठीक हैं भईया, दे-दो समर्थन।
ÓÓवह ऐसे चहका मानो दुनिया की सारी खुशियां उसे मिल गई हों। उसे प्रसन्नता थी कि सबसे पहले उसी ने समर्थन दिया।
मोहन बाबू दरवाजा बंद कर ठीक से बैठ भी नहीं पाए थे कि महिला की आवाज सुनाई दी। वह बदहवास-सी चिल्लाए जा रही थी- समर्थन ले लो! समर्थन ले लो!! समर्थन ले लो!!!
उन्हें दरवाजा खोलना पड़ा।महिला की सांसें तेज-तेज चल रही थीं। उसने सांसों के सम होने का भी इंतजार नहीं किया। वह समर्थन देने की रट लगाए रही।
मोहन बाबू ने समझाने की कोशिश की, ''बहनजी, मुझे समर्थन की कोई जरूरत नहीं है। मुझे बिना किसी मोल-भाव के समर्थन मिल चुका है।
ÓÓइससे उसकी बेचैनी और बढ़ गई। वह दार्शनिक मुद्रा में बोलीं, ''हमने भी प्रधानमंत्री के ख्वाब देखे थे, लेकिन बेदर्द जनता की बेरुखी ने सब गुड़-गोबर कर दिया। जनता ने हमें थोड़ा भी समझा होता तो हम समर्थन दे नहीं, ले रहे होते। और अगर देना भी पड़ता तो अच्छी-खासी कीमत वसूलते। खैर छोड़ो यह सब! बस समर्थन ले लो।
ÓÓमोहन बाबू कुछ कह पाते, इससे पहले ही वह समर्थन देकर चलती बनी। उसने 'हांÓ या 'नाÓ का भी इंतजार नहीं किया।
मोहन बाबू दरवाजा बंद कर मुड़े ही थे कि मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। उधर से कोई रोबदार आवाज सुनाई थी, ''अपन तेरे को समर्थन देता।
ÓÓ''लेकिन आप हैं कौन?ÓÓ मोहन बाबू ने पूछा।उसने मोहन बाबू की बात का जवाब नहीं दिया। वह अपनी रौ में बोला, ''लेकिन-वेकिन छोड़। अपन समर्थन देता तो देता। तेरो को लेना नहीं पड़ेगा।ÓÓ कहकर उसने फोन काट दिया।
मोहन बाबू परेशान हैं- समर्थन देने वालों से। बिन मांग समर्थन दिए जा रहे हैं। अब जैसे ही कोई दरवाजा खटखटाता है या फोन की घंटी बजती है तो मोहन बाबू घबरा जाते हैं- जरूर कोई समर्थन देने वाला ही होगा।
Wednesday, 15 April 2009
राजनीति का फिल्मीकरण
चुनाव पर्व
चुनाव की डुगडुगी बजते ही पूरे देश मे गहमागहमी शुरू हो गई है। पर्व का सा माहौल हो गया है। भारत पर्वों का देश है। आए दिन कोई-न-कोई पर्व मनाया जाता है। लेकिन सभी पर्व विभिन्न रूपों में बंटे हैं। कोई हिंदुओं का है तो कोई मुस्लिमों का। किसी को दक्षिण भारत में मनाया जाता है तो किसी को उत्तर भारत में। कोई आज मना रहा है तो कोई कल मनाने की तैयारी कर रहा है। चुनाव ही मात्र एक ऐसा पर्व है, जिसे सब मिलजुलकर हर्षो-उल्लास से मनाते हैं। पूरी दुनिया में पर्वों को हर साल मनाए जाने की परंपरा है। लेकिन चुनाव पर्व पांच साल में एक बार मनाया जाता है। ऐसा क्यों होता है, यह मेरी समझ से बाहर है। हम परंपरावादी लोग हैं। परंपराओं की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। चुनाव पर्व भी हर साल मनाया जाना चाहिए। पांच साल में नेता ही नहीं, जनता भी भूल जाती है कि किसने क्या वायदा किया था? जीतने और हारने वाले दोनों ही जनता से पांच साल के लिए मुंह मोड़ लेते हैं। इससे देश का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। न गरीबी दूर हो पा रही और न ही बेरोजगारी। दलितों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में भी कमी नहीं आ पा रही है। अपराध और भ्रष्टाचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। भले ही हम पर्ववादी हैं, लेकिन जब भी कोई पर्व आता है तो महंगाई का रोना रोने लगते हैं। महीने के खर्चे में कतर-ब्यौंत कर जैसे-तैसे पर्व को निपटाते हैं। लेकिन चुनाव पर्व में जनता का एक पैसा भी खर्च नहीं होता। खाने-पीने से लेकर घूमने-फिरने तक सभी का इंतजाम नेताजी कर रहे हैं। पोस्टर छपवाने-चिपकाने, होर्डिंग लगवाने और चुनाव प्रचार करने में बहुत से लोगों को लगाया जा रहा है। वेबसाइट बनवाई जा रही है। कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन बेरोजगारों को रोजगार मिल गया है। कच्ची दारू और अवैध हथियार जैसे कुटीर उद्योग को बढ़ावा मिल रहा है। नेता एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी और पोस्टरबाजी कर अच्छी-खासी नौटंकी कर रहे हैं। इससे मुफ्त का मनोरंजन हो रहा है। देश के कर्णधारों का विवेक जाग उठा है। वे अंतरात्मा की पुकार सुनने लगे हैं। गठबंधन बनने और टूटने लगे हैं। हाथ थामने वाले हाथ झटकने का दौर शुरू हो गया है। कई वर्षों तक साथ रहने वालों को भी कमल में किचड़ दिखाई देने लगा है। किसी को साइकिल में पंक्चर होने का डर सताने लगा है तो कोई हाथी से कूद कर नई सवारी ढूंढ रहा है। देश के कर्णधारों को समाजवाद, भ्रष्टाचार, धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे याद आने लगे हैं। झुग्गी-झोपड़ी से लेकर किसानों-मजदूरों की चिंता सताने लगी है। बेरोजगारी, गिरते जीवन स्तर, दलितों पर हो रहे अत्याचार, सत्ता में महिलाओं की भागेदारी आदि पर मंथन होने लगा है। कल तक जिनकी कब्र खोदने की कसमें खाई जा रही थीं, आज उन्हें शिखर पर पहुंचाने का दम भरा रहा है। जिनके साथ जिंदगी बिता दी, अब उनमें खोट दिखाई देने लगा है। अब पता चल रहा है कि जिस पार्टी के दस साल से पदाधिकारी थे, वह तो धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाए सांप्रदायिक पार्टी है। देश के कर्णधारों में विनम्रता आ गई है। पहले बार-बार जाकर भी नहीं मिलने वाले नेता, दर-दर पर जाकर मत्था टेकने लगे हैं। एक-से-एक लुभवाने वायदे किए जा रहे हैं। जिन्होंने जिंदगी में खाट तक नहीं देखी थी, वे झोपड़ी में रात गुजारने लगे हैं। समाजवाद की याद आने लगी है। रिक्शे में बैठकर फिल्म देखने जा रहे हैं। कोई फोन लगवाने और बैंक खाते खुलवाने का विश्वास दिला रहा है तो कोई आम आदमी के बढ़ते कदमों से देश को बुलंदी पर पहुंचाना चाहता है। आम आदमी, जनसेवा जैसे शब्द हर नेता की जबान पर आ गए हैं। लगता है, चुनाव के बाद देश में रामराज आ जाएगा। हर ओर सुख ही सुख होगा। अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को मुख्यधारा से जोडऩा एक बड़ी समस्या है। ये लोग पुलिस प्रशासन के लिए सिरदर्द बने रहते हैं। सरकार हर तरह के कदम उठाती है। फिर भी सफलता का प्रतिशत लगभग शून्य रहता है। लेकिन चुनाव पर्व में भाग लेने के लिए डाकू भी संत बन गए हैं। बात-बात पर पिस्टल तानने वाले बत्तीसी दिखा रहे हैं। जो काम सरकार भी नहीं कर सकी, उसे चुनाव पर्व ने बिना किसी प्रयास के कर दिखाया है। अब तक अपराधी किस्म के न जाने कितने लोग चुनाव पर्व में कामयाब होकर मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। जिस पर्व के इतने लाभ हो, वह हर वर्ष क्यों नहीं मनाया जाना चाहिए।
Friday, 10 April 2009
कुर्सी पुराण
यह संसार नश्वर है। रिश्ते-नाते मायाजाल है। एक दिन सब यहीं छूट जाएगा। कौन किसके साथ आया था और कौन साथ जाएगा? इसलिए किसी बंधन के मोहपाश में मत फंस। काट दे सभी को। एक दिन सब कुछ नष्ट हो जाएगा। इस संसार में यदि कुछ सारस्वत है, तो वह है कुर्सी। यह कल थी, आज है और कल भी रहेगी। इसे पाने के लिए ही हर कोई तडफ़ता है। अच्छा-बुरा जो भी करता है, वह सब इसके लिए करता है। कुर्सी में ऐसा जादू है, जो इस पर विराजता है वह पवित्र हो जाता है। उसके सारे दोष गुण में बदल जाते हैं। उसकी कमियां भी अच्छाई लगने लगती हैं। उसकी मूर्खताओं में विद्वता ढूंढी जाती है। उसे याद रखा जाता है। लक्ष्मी और सरस्वती में भले ही बैर हो, लेकिन कुर्सी की बदौलत दोनों सध जाती हैं। इतिहास गवाह है कि अनपढ़ और जाहिल कुर्सीवानों के यहां भी विद्वान सजदा करते हैं। उसकी कृपा पाने के लिए तरसते हैं। एक बात और जो जितने तिकड़म और जोड़तोड़ से कुर्सी प्राप्त करता है, इतिहास उसे उतना ही अधिक स्थान देता है। कुर्सी मुर्दे में भी जान फूंक देती है। बुढ़ापे में सूखे गालों में भी हरियाली आ जाती है। वह घोड़े सा सरपट दौडऩे लगता है। यह याद रख कुर्सी आदमी के लिए नहीं, बल्कि आदमी कुर्सी के लिए बना है। इसलिए खुद को कुर्सी से बड़ा मत समझ। जीना उसका जीना है, जिसने कुर्सी पा ली। अर्जुन की तरह आंख बस इसी पर टिका। तभी विजयश्री हासिल हो सकती है। ठीक किया जो वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ दिया। यह भी अच्छा किया जो रिश्तों को लात मार दी। भाई-बहन, जीजा-साला, बापा-बेटा यह कोरी भावुकता है। क्या रखा है इसमें? पौराणिक काल से आज तक सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे कि कुर्सी के लिए बेटे ने बाप को बाप नहीं समझा और भाई को भाई। कुर्सी के लिए पहला विद्रोह घर से ही होता है। और फिर न तो शरीर तुम्हारा है और न ही तुम इसके हो। शरीर पंच तत्वों आग, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से बना है। एक दिन यह शरीर इन्हीं पंच तत्वों में विलीन हो जाएगा। सब नाते-रिश्ते इस नश्वर शरीर से ही तो हैं। फिर उनका कैसा मोह? संसार परिवर्तनशील है। हर पल कुछ-न-कुछ बदलता रहता है। ऐसे में सिद्धांत और नैतिकता की बात करना बेइमानी है। ये सब भी बदलते रहते हैं। जीतता वही है जिसकी निगाह भविष्य पर टिकी हो। और भविष्य है कुर्सी। कुर्सी मिल जाएगी तो नाश्ते-रिश्तेदारों और बंधु-बांधव गुड़ पर चींटे की तरह खींचे आएंगे। जो कुर्सी प्राप्त नहीं कर पाएगा, उसे कम से कम पांच साल तक इंतजार करना पडग़ा। जो आज गले लगा रहे हैं, वह भी दुत्कार देंगे। फिर खुजलाए कुत्ते की तरह फिरते रहो गली-गली। क्यों व्यर्थ चिंता करे हो? तुम क्यों भयभीत हो रहे हो? जो हुआ वह अच्छे के लिए हुआ, जो हो रहा है वह अच्छे के लिए हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छे के लिए होगा। दुनिया के रंगमंच में हम सभी कठपुतली हैं, जिसकी डोर नियति के हाथ में है। हम कुछ नहीं करते। जो होना होता है, वह होता है। भूत के लिए पश्चाताप मत कर, भविष्य के लिए चिंतित मत हो, केवल कुर्सी पर ध्यान रखो। यह संसार रणक्षेत्र है। युद्ध और प्रेम मेंं सब कुछ जायज है। याद रखो, वीर ही राज करता है और हर सुख भोगता है। बिना लड़े कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। बस चुनाव जीत। चाहे फर्जी मतदान करना पड़े। साम दाम दंढ भेद चाहे जिसका इस्तेमाल करना पड़े। जैसे भी हो कुर्सी प्राप्त कर। इसे ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना। इस जगत मेें जो कुछ भौतिक और आध्यात्मिक है, सब ब्रह्ममय है। कुर्सी प्राप्त करना भी ब्रह्ममय होना ही है। इस दुनिया में स्वर्ग के सुख भागने का सबसे सरल मार्ग कुर्सी है। कुर्सी मिल गई तो समझो यह जहां मिल गया। इसलिए हे वीर! सोच-विचार में समय नष्ट मत कर। यह मत सोच कि सामने भाई है या भतीजा, जीजा है या साला। तेरा मकसद सिर्फ सीट जीतना है। मन की सभी दुविधाओं को निकाल दे। मायाजाल में मत फंस। कहीं ऐसा न हो कि पांच साल तक पछताना पड़े।
