पानी की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके लिए धरना-प्रदर्शन और जाम लगाना तथा आपसी संघर्ष आम बात हो गई है। एक आंकडे़ के अनुसार विश्व के अधिकांश लोगों के लिए पीने का पानी दुर्लभ हो गया है।् हर साल कम से कम 20 करोड़ लोग गंदा पानी पीने की वजह से बीमार पड़ते हैं। इनमें से 20 लाख मर जाते हैं। यह कहा जा रहा हैै कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। यदि हम वक्त रहते नही संभले तो स्थिति यह होगी कि धन-दौलत, सुख-सुविधा सब कुछ होगा, लेकिन पानी के बिना सब बेकार। पीने लायक पानी के स्रोत सीतित हैं। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल पानी का संचयन और अपव्यय है। एक-एक बूंद बचाकर किस तरह लाखों लीटर पानी बचाया जा सकता है, इसकी मिसाल हैं-चर्चित लेखक और कार्टूनिस्ट आबिद सुरती। उन्होंने पानी बचाने के लिए एक अनोखी पहल की है। वह फरवरी, 2007 से एक-एक बूंद पानी की बचाने में लगे हुए हैं। इस अभियान को नाम दिया- ‘सेव एवरी ड्ाप’ और ड्रॉपडेड। उन्होंने अभियान मीरा रोड, मुंबई स्थित अपार्टमेंट्स में शुरू किया। इससे अब तक करीब पांच लाख लीटर पानी बचा चुके हैं।
आबिद सुरती ने बताया कि जब वह बच्चे थे तो हर सुबह घर के सामने म्यूनिसिपैलिटी के नल पर लंबी कतार लगती थी। पानी लेने के लिए मारामारी रहती थी। पानी आने के समय रोजाना सुबह के उन दस मिनटों में वहां युद्ध की सी स्थिति रहती थी। जो दिनभर का पानी भर पाने में सफल हो पाता वह खुद को योद्धा समझता और बाकी लोग आपस में लड़- भिड़कर हारे सिपाही की तरह घर लौट आते। इन दिनों मीरा रोड के जिस छोटे से फ्लैट में वह रह रहे हैं, वहां भी पानी दस मिनट के लिए ही आता है, फर्क इतना है कि अब कतार में खड़ा नहीं होना पड़ता। इस तरह बचपन से लेकर अब तक पानी को लेकर उनके मन में एक उथल-पुथल सी थी। वह किसी के घर जाते और वहां नल से टपकते पानी की आवाज सुनाई देती तो भीतर अजीब सी बेचैनी होती थी। पानी की बूंद की टप-टप दिल पर हथौडे़ का सा वार करती। वह घर में रहने वालों से नल ठीक कराने को कहते तो अकसर जवाब आता- हां ठीक तो कराना है, लेकिन कोई मिलता ही नहीं या फिर समय नहीं मिल पा रहा है आदि।
एक दिन उनकी नजर हिंदुस्तान टाइम्स, मुंबई की एक खबर पर पड़ी। लिखा था- जब किसी गलते हुए नल से हर पल पानी टपकता है तो एक महीने में लगभग 1000 लीटर पानी बहकर बर्बाद हो जाता है। उस दिन उनकी समझ में आ गया कि उन्हें क्या करना है। उन्होंने एक प्लंबर और अपनी ग्राफिक डिजाइनर तेजल को साथ लिया और संकल्प लिया कि सप्ताह में एक दिन अपने आसपास के इलाके के घरों में जाकर लीकेज नल निशुल्क ठीक किया करेंगे। और इस तरह बन गई तीन लोगों की ड्रॉपडेड टीम।
उन्होंने 2007 में इस अभियान की शुरुआत की। इसमें पहला निवेश था प्लंबर की 150 रुपये महीने की पगार का। यह साल अंतरराष्ट्रीय जल वर्ष भी था। संयोगवश इसी वर्ष उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान की ओर से एक लाख रुपये का सौहार्द सम्मान मिला। उससे प्राप्त राशि उन्होंने अभियान में लगा दी। उन्होंने इसे वन मैन एनजीओ का लोगो बनवाने, पर्चे छपवाने, टी-शर्ट बनवाने और प्लंबर की पगार आदि के काम में खर्च किया।
उन्होंने अभियान के लिए रविवार का दिन चुना और शुरुआत की अपने ही इलाके से। वह हर सप्ताह एक बिल्डिंग को चुनकर गुरुवार को वहां की सोसायटी सेक्रेटरी से मुलाकात कर उनसे इस काम की अनुमति लेते। शुक्रवार को टीम वहां जाकर ड्रॉपडेड के पर्चे बांट देती, जिससे कि वहां रहने वालों को यह अभियान समझ आ जाए। शनिवार को नोटिस बोर्ड पर सूचना चिपका दी जाती, जिससे कि बिल्ड़िंग में रहने वाले लोग अपनी शिकायत दर्ज करवा दें। इससे रविवार को जब वे लोग वहां पहुंचते तो उन लोगों की सूची मिल जाती, जिनके घरों में नल लीकेज कर रहे हैं। रविवार को ड्रॉपडेड टी-शर्ट पहनकर वे उनके घरों में जाकर बहते नल ठीक करते। हर रविवार को पांच घंटे वे इस काम को देते।उन्होंने बताया कि कुछ अकेले रह रहे बुजुर्गों को छोड़कर अधिकतर लोगों ने इस काम के प्रति भरपूर उत्साह दिखाया। वे नल ठीक करने जाते हैं, तब घर के लोगों से जो स्नेह और सत्कार मिलता है, उससे काम को निरंतर जारी रखने की ऊर्जा दोगुनी हो जाती है। चाय और खाने के स्नेहपूर्ण निमंत्रण ठुकराना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने बताया कि 2007 में टीम ने मीरा रोड में 1533 घरों का निरीक्षण किया, 384 बहते नल ठीक किए और लगभग 3।84 लाख लीटर पानी बचाया। और अब तक करीब पांच लाख लीटर पानी बचा चुके हैं।
इसका खर्चा निकालने के लिए उन्होंने ‘ड्रॉपडेड’ के लोगो की टी-शर्ट बनवाई हुई हैं। यह उन्हें सौ रुपये में पड़ती है। वह अपने परिचितों से टी-शर्ट को सौ से कुछ अधिक दाम पर खरीदने का आग्रह करते हैं। सौ से अधिक जो रुपये मिलते हैं, उनसे वह खर्चा चला रहे हैं।
पंजाब, मध्यप्रदेश आदि अन्य प्रांतों में भी यह अभियान शुरू हो गया है। लोग बूंद-बूंद पानी बचा रहे हैं। फिल्म अभिनेता गुलशन ग्रोवर ने भी जुहू में इस तरह का अभियान शुरू कर दिया है।
आबिद सुरती ने बताया कि अब अभियान में स्कूलों को भी जोड़ लिया हैं। इसकी शुरुआत कास्मोपाल्इटन हाईस्कूल से इसी वर्ष से की। प्रिंसिपल को अभियान के बारे में समझाया। उन्होंने इसे सब्जेक्ट ही बना दिया और तय किया कि जो विद्यार्थी इस अभियान में भाग लेगा, उसे पांच प्रतिशत अतिरिक्त नंबर दिए जाएंगे। विद्यार्थियों को फार्म दिया गया। इसमें छात्र का नाम, उसकी क्लास आदि के अलावा सोसायटी का नाम, सेक्रेटरी का नंबर आदि जानकारियां भरने को दी गईं। तीन-चार महीने पहले करीब 250 छात्र-छात्राओं की रैली निकाली गई। पचास-पचास बच्चों के पांच ग्रुप बनाए गए। उन्हें अलग-अलग दिशाओं में भेजा गया। उनके हाथों पर ड्रॉपडेड के बैनर थे। उन्होंने घर-घर जाकर लोगोें को समझाया कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक-एक बूंद पानी की बचाएं। इस अभियान का जबरदस्त रेसपोंस मिला। 150 बिल्डिंगों से इसके लिए प्रमीशन मिल गई। अब प्लंबर की संख्या बढ़ाकर छह कर दी गई। हर सप्ताह एक प्लंबर के साथ पांच-पांच छात्र अलग-अलग बिल्डिंगों में जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास दो स्कूल और आएं हैं। गर्मियों की छुट्टियों के बाद उन्हें भी अभियान में शामिल कर लिया जाएगा। और इस तरह कारवां बढ़ता जा रहा है।
आबित सुरती इस सेवा को चैबीस घंटे की करना चाहते हैं ताकि कहीं से भी फोन आने पर प्लंबर तुरंत जाकर लीकेज ठीक कर दे। उनकी मंशा अभियान का देश की गली-गली तक पहुंचाने की हैंै। इसके लिए जरूरत है फंडिंग की। वह अभी अभियान को घर से चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई फंडिंग कर दे तो इसके अलग दफ्तर खोल लें और सहायक रख लें। जिससे इस काम को और विस्तार दिया जा सके।
उन्होंने कहा कि कोई भी अपने क्षेत्र में इस अभियान को शुरू कर सकता है। इसके लिए हम फ्रैंचाइज नहीं देते। यदि कोई इच्छुक है तो पैम्फलेट का फार्मेट भेज देंगे, वह इस पर अपना नंबर डालकर अभियान शुरू कर सकता है।

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