Wednesday, 15 April 2009

राजनीति का फिल्मीकरण

लोकतंत्र में संख्या बल का बहुत महत्व है। इसलिए हर पार्टी संख्या बढ़ाने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने से बाज नहीं आती। देश की आजादी के बाद शुरू हुआ यह खेल आज तक जारी है। इकसठ साल में देश में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा है। दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति के बाद सूचना का आदान-प्रदान देश के दूरदराज के क्षेत्रों में भी सुगम हो गया है। लोगों में जागरूकता आई है। ऐसे में उम्मीद थी कि समय के साथ-साथ लोकतंत्र में परिपक्वता आएगी। जनता जाति-पांत, क्षेत्रवाद आदि को छोड़कर पार्टी की नीति और उम्मीदवार की छवि के आधार पर मत देगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आज भी जाति, मजहब, क्षेत्र जैसे फैक्टर हावी हैं। पार्टियों में धनबल और बाहुबल का खुलेआम प्रयाग हो रहा है। संख्या बढ़ाने के इस खेल में ही राजनीतिक दलों ने चर्चित हस्तियों को उम्मीदवार बनाने का हथकंडा भी अपना लिया है। सभी जानते हैं कि अपने देश में फिल्मी कलाकारों और क्रिकेटरों से ज्यादा लोकप्रिय कोई नहीं है। राजनीतिक दलों को क्रिकेटरों और फिल्म सितारों को उम्मीदवार बनाने के अच्छे परिणाम भी मिले हैं। अकसर ऐसे प्रत्याशी किसी बड़ी राजनीतिक शख्सियत को भी चित कर देते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में 1984 के इलाहाबाद के चुनाव को ऐतिहासिक कहा जा सकता है। राजीव गांधी ने हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ अमिताभ बच्चन को मैदान में उतार दिया। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रह चुके बहुगुणा को अमिताभ ने करारी मात दी। आधुनिक राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले जो बहुगुणा इंदिरा गांधी के लिए सदा चुनौती बने रहे, उन्हें राजीव ने एक फिल्म स्टार के सहारे बड़े आराम से किनारे लगा दिया। इस पर बहस की गुंजाइश है कि अमिताभ ने राजनीति में कोई सकारात्मक भूमिका निभाई या नहीं, लेकिन यह सभी जानते हैं कि वह जल्द ही राजनीति को अलविदा कह सपनों की दुनिया में लौट गए। बाद के वर्षों में सुनील दत्त, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, गोविंदा, राजबब्बर, अरविंद त्रिवेदी, नीतीश भारद्वाज, जयाप्रदा, दीपिका चिखलिया आदि ने संसद में कदम रखा। फिल्म से राजनीति में आए अधिकांश कलाकार फिल्मों का मोह नहीं छोड़ पाए। इसलिए वे क्षेत्र के लोगों को समय नहीं दे पाए। और जो समय भी नहीं दे पाए, वे क्षेत्रवासियों की समस्याओं का समाधान क्या करवाते? अपवाद स्वरूप एक-दो फिल्म स्टार सांसद को छोड़ दें तो किसी ने लोकसभा में किसी मुद्दे पर सक्रिय भूमिका नहीं निभाई और न कोई मुद्दा उठाया। दक्षिण भारत में भी फिल्मी कलाकारों- एमजी रामचंद्रन, एनटी रामाराव, जयललिता आदि ने राजनीति की लंबी पारी खेली। ये तीनों ही अपने राज्यों में मुख्यमंत्री तक बने। जयललिता तीसरे मोर्च की महत्वपूर्ण नेता हैं। हाल ही में सुपर स्टार चिरंजीवी ने आंध्र प्रदेश में प्रजाराज्यम पार्टी का गठन किया है। एक बड़ा फर्क यह है कि दक्षिण भारतीय फिल्मी कलाकार राजनीति में आकर पूरी तरह इसी के हो गए। उन्होंने राजनीति और फिल्म की दो नावों में सवारी नहीं की। फिल्म स्टार या अन्य क्षेत्रों के चर्चित व्यक्ति राजनीति में आएं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में चुनाव लडऩे का अधिकार विशेष परिस्थितियों को छोड़कर हर किसी को है, लेकिन फिल्म स्टारों के ग्लैमर को जिस तरह भुनाया जा रहा है वह गलत है। दिग्गज नेताओं के खिलाफ इनके इस्तेमाल को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। एक तरह से यह उतना ही घातक है जितना कि धनबल और बाहुबल का प्रयोग। फिल्म स्टारों को उम्मीदवार बनाने से पार्टी का जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता ठगा जाता है। किसी क्षेत्र में वर्षों से पार्टी के लिए काम कर एक आदमी पार्टी को एक खास मुकाम तक पहुंंचाता है। वह उम्मीद रखता है कि उसे जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए उम्मीदवार बनाया जाएगा, लेकिन ऐन मौके पर किसी फिल्म कलाकार को मैदान में उतार दिया जाता है तो क्या यह उस कार्यकर्ता का हक मारना नहीं है? यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। यह तानाशाही रवैया है। जमीन से जुड़े कार्यकर्ता की अवेहलना है। तरीका तो यह कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं से विचार-विमर्श कर उनके बीच से ही उम्मीदवार तय किया जाए, लेकिन यह हो नहीं रहा है। ऐसे में कार्यकर्ताओं की जनसमस्याओं से जूझने और उनका समाधान करने में रुचि घट रही है। वह भी शार्टकट तलाश रहा है। इससे राजनीतिक माहौल अराजक हो गया है। सभी पार्टियों में उठापटक इसका उदाहरण है। जो चर्चित व्यक्ति पार्टी से जुड़े हैं और उसकी नीतियों को मानते और अपनाते हैं, उन्हें पार्टी का उम्मीदवार बनाना फिर भी ठीक है। लेकिन जिन्हें सिर्फ टिकट से मतलब है, चाहे ये दे या वो दे। ऐसे उम्मीदवार न पार्टी हित में हैं और न ही जनहित में। इस बार भी कई चर्चित लोग चुनाव मैदान में हैं। लोगों को सोचना होगा कि वे जिसे अपना प्रतिनिधि चुन रहे हैं वह उनके लिए उपलब्ध होगा भी या नहीं? उनकी समस्याओं का समाधान करवाएगा भी या नहीं? जो क्षेत्र में उपलब्ध भी नहीं होता वह क्या विकास कराएगा? ग्लैमर की चकाचौंध में वोट डालकर पांच साल तक सिर पकडऩे से बेहतर है कि पहले ही सही चुनाव किया जाए।

चुनाव पर्व

चुनाव की डुगडुगी बजते ही पूरे देश मे गहमागहमी शुरू हो गई है। पर्व का सा माहौल हो गया है। भारत पर्वों का देश है। आए दिन कोई-न-कोई पर्व मनाया जाता है। लेकिन सभी पर्व विभिन्न रूपों में बंटे हैं। कोई हिंदुओं का है तो कोई मुस्लिमों का। किसी को दक्षिण भारत में मनाया जाता है तो किसी को उत्तर भारत में। कोई आज मना रहा है तो कोई कल मनाने की तैयारी कर रहा है। चुनाव ही मात्र एक ऐसा पर्व है, जिसे सब मिलजुलकर हर्षो-उल्लास से मनाते हैं। पूरी दुनिया में पर्वों को हर साल मनाए जाने की परंपरा है। लेकिन चुनाव पर्व पांच साल में एक बार मनाया जाता है। ऐसा क्यों होता है, यह मेरी समझ से बाहर है। हम परंपरावादी लोग हैं। परंपराओं की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। चुनाव पर्व भी हर साल मनाया जाना चाहिए। पांच साल में नेता ही नहीं, जनता भी भूल जाती है कि किसने क्या वायदा किया था? जीतने और हारने वाले दोनों ही जनता से पांच साल के लिए मुंह मोड़ लेते हैं। इससे देश का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। न गरीबी दूर हो पा रही और न ही बेरोजगारी। दलितों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में भी कमी नहीं आ पा रही है। अपराध और भ्रष्टाचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। भले ही हम पर्ववादी हैं, लेकिन जब भी कोई पर्व आता है तो महंगाई का रोना रोने लगते हैं। महीने के खर्चे में कतर-ब्यौंत कर जैसे-तैसे पर्व को निपटाते हैं। लेकिन चुनाव पर्व में जनता का एक पैसा भी खर्च नहीं होता। खाने-पीने से लेकर घूमने-फिरने तक सभी का इंतजाम नेताजी कर रहे हैं। पोस्टर छपवाने-चिपकाने, होर्डिंग लगवाने और चुनाव प्रचार करने में बहुत से लोगों को लगाया जा रहा है। वेबसाइट बनवाई जा रही है। कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन बेरोजगारों को रोजगार मिल गया है। कच्ची दारू और अवैध हथियार जैसे कुटीर उद्योग को बढ़ावा मिल रहा है। नेता एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी और पोस्टरबाजी कर अच्छी-खासी नौटंकी कर रहे हैं। इससे मुफ्त का मनोरंजन हो रहा है। देश के कर्णधारों का विवेक जाग उठा है। वे अंतरात्मा की पुकार सुनने लगे हैं। गठबंधन बनने और टूटने लगे हैं। हाथ थामने वाले हाथ झटकने का दौर शुरू हो गया है। कई वर्षों तक साथ रहने वालों को भी कमल में किचड़ दिखाई देने लगा है। किसी को साइकिल में पंक्चर होने का डर सताने लगा है तो कोई हाथी से कूद कर नई सवारी ढूंढ रहा है। देश के कर्णधारों को समाजवाद, भ्रष्टाचार, धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे याद आने लगे हैं। झुग्गी-झोपड़ी से लेकर किसानों-मजदूरों की चिंता सताने लगी है। बेरोजगारी, गिरते जीवन स्तर, दलितों पर हो रहे अत्याचार, सत्ता में महिलाओं की भागेदारी आदि पर मंथन होने लगा है। कल तक जिनकी कब्र खोदने की कसमें खाई जा रही थीं, आज उन्हें शिखर पर पहुंचाने का दम भरा रहा है। जिनके साथ जिंदगी बिता दी, अब उनमें खोट दिखाई देने लगा है। अब पता चल रहा है कि जिस पार्टी के दस साल से पदाधिकारी थे, वह तो धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाए सांप्रदायिक पार्टी है। देश के कर्णधारों में विनम्रता आ गई है। पहले बार-बार जाकर भी नहीं मिलने वाले नेता, दर-दर पर जाकर मत्था टेकने लगे हैं। एक-से-एक लुभवाने वायदे किए जा रहे हैं। जिन्होंने जिंदगी में खाट तक नहीं देखी थी, वे झोपड़ी में रात गुजारने लगे हैं। समाजवाद की याद आने लगी है। रिक्शे में बैठकर फिल्म देखने जा रहे हैं। कोई फोन लगवाने और बैंक खाते खुलवाने का विश्वास दिला रहा है तो कोई आम आदमी के बढ़ते कदमों से देश को बुलंदी पर पहुंचाना चाहता है। आम आदमी, जनसेवा जैसे शब्द हर नेता की जबान पर आ गए हैं। लगता है, चुनाव के बाद देश में रामराज आ जाएगा। हर ओर सुख ही सुख होगा। अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को मुख्यधारा से जोडऩा एक बड़ी समस्या है। ये लोग पुलिस प्रशासन के लिए सिरदर्द बने रहते हैं। सरकार हर तरह के कदम उठाती है। फिर भी सफलता का प्रतिशत लगभग शून्य रहता है। लेकिन चुनाव पर्व में भाग लेने के लिए डाकू भी संत बन गए हैं। बात-बात पर पिस्टल तानने वाले बत्तीसी दिखा रहे हैं। जो काम सरकार भी नहीं कर सकी, उसे चुनाव पर्व ने बिना किसी प्रयास के कर दिखाया है। अब तक अपराधी किस्म के न जाने कितने लोग चुनाव पर्व में कामयाब होकर मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। जिस पर्व के इतने लाभ हो, वह हर वर्ष क्यों नहीं मनाया जाना चाहिए।

Friday, 10 April 2009

कुर्सी पुराण

यह संसार नश्वर है। रिश्ते-नाते मायाजाल है। एक दिन सब यहीं छूट जाएगा। कौन किसके साथ आया था और कौन साथ जाएगा? इसलिए किसी बंधन के मोहपाश में मत फंस। काट दे सभी को। एक दिन सब कुछ नष्ट हो जाएगा। इस संसार में यदि कुछ सारस्वत है, तो वह है कुर्सी। यह कल थी, आज है और कल भी रहेगी। इसे पाने के लिए ही हर कोई तडफ़ता है। अच्छा-बुरा जो भी करता है, वह सब इसके लिए करता है। कुर्सी में ऐसा जादू है, जो इस पर विराजता है वह पवित्र हो जाता है। उसके सारे दोष गुण में बदल जाते हैं। उसकी कमियां भी अच्छाई लगने लगती हैं। उसकी मूर्खताओं में विद्वता ढूंढी जाती है। उसे याद रखा जाता है। लक्ष्मी और सरस्वती में भले ही बैर हो, लेकिन कुर्सी की बदौलत दोनों सध जाती हैं। इतिहास गवाह है कि अनपढ़ और जाहिल कुर्सीवानों के यहां भी विद्वान सजदा करते हैं। उसकी कृपा पाने के लिए तरसते हैं। एक बात और जो जितने तिकड़म और जोड़तोड़ से कुर्सी प्राप्त करता है, इतिहास उसे उतना ही अधिक स्थान देता है। कुर्सी मुर्दे में भी जान फूंक देती है। बुढ़ापे में सूखे गालों में भी हरियाली आ जाती है। वह घोड़े सा सरपट दौडऩे लगता है। यह याद रख कुर्सी आदमी के लिए नहीं, बल्कि आदमी कुर्सी के लिए बना है। इसलिए खुद को कुर्सी से बड़ा मत समझ। जीना उसका जीना है, जिसने कुर्सी पा ली। अर्जुन की तरह आंख बस इसी पर टिका। तभी विजयश्री हासिल हो सकती है। ठीक किया जो वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ दिया। यह भी अच्छा किया जो रिश्तों को लात मार दी। भाई-बहन, जीजा-साला, बापा-बेटा यह कोरी भावुकता है। क्या रखा है इसमें? पौराणिक काल से आज तक सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे कि कुर्सी के लिए बेटे ने बाप को बाप नहीं समझा और भाई को भाई। कुर्सी के लिए पहला विद्रोह घर से ही होता है। और फिर न तो शरीर तुम्हारा है और न ही तुम इसके हो। शरीर पंच तत्वों आग, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से बना है। एक दिन यह शरीर इन्हीं पंच तत्वों में विलीन हो जाएगा। सब नाते-रिश्ते इस नश्वर शरीर से ही तो हैं। फिर उनका कैसा मोह? संसार परिवर्तनशील है। हर पल कुछ-न-कुछ बदलता रहता है। ऐसे में सिद्धांत और नैतिकता की बात करना बेइमानी है। ये सब भी बदलते रहते हैं। जीतता वही है जिसकी निगाह भविष्य पर टिकी हो। और भविष्य है कुर्सी। कुर्सी मिल जाएगी तो नाश्ते-रिश्तेदारों और बंधु-बांधव गुड़ पर चींटे की तरह खींचे आएंगे। जो कुर्सी प्राप्त नहीं कर पाएगा, उसे कम से कम पांच साल तक इंतजार करना पडग़ा। जो आज गले लगा रहे हैं, वह भी दुत्कार देंगे। फिर खुजलाए कुत्ते की तरह फिरते रहो गली-गली। क्यों व्यर्थ चिंता करे हो? तुम क्यों भयभीत हो रहे हो? जो हुआ वह अच्छे के लिए हुआ, जो हो रहा है वह अच्छे के लिए हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छे के लिए होगा। दुनिया के रंगमंच में हम सभी कठपुतली हैं, जिसकी डोर नियति के हाथ में है। हम कुछ नहीं करते। जो होना होता है, वह होता है। भूत के लिए पश्चाताप मत कर, भविष्य के लिए चिंतित मत हो, केवल कुर्सी पर ध्यान रखो। यह संसार रणक्षेत्र है। युद्ध और प्रेम मेंं सब कुछ जायज है। याद रखो, वीर ही राज करता है और हर सुख भोगता है। बिना लड़े कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। बस चुनाव जीत। चाहे फर्जी मतदान करना पड़े। साम दाम दंढ भेद चाहे जिसका इस्तेमाल करना पड़े। जैसे भी हो कुर्सी प्राप्त कर। इसे ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना। इस जगत मेें जो कुछ भौतिक और आध्यात्मिक है, सब ब्रह्ममय है। कुर्सी प्राप्त करना भी ब्रह्ममय होना ही है। इस दुनिया में स्वर्ग के सुख भागने का सबसे सरल मार्ग कुर्सी है। कुर्सी मिल गई तो समझो यह जहां मिल गया। इसलिए हे वीर! सोच-विचार में समय नष्ट मत कर। यह मत सोच कि सामने भाई है या भतीजा, जीजा है या साला। तेरा मकसद सिर्फ सीट जीतना है। मन की सभी दुविधाओं को निकाल दे। मायाजाल में मत फंस। कहीं ऐसा न हो कि पांच साल तक पछताना पड़े।