चुनाव की डुगडुगी बजते ही पूरे देश मे गहमागहमी शुरू हो गई है। पर्व का सा माहौल हो गया है। भारत पर्वों का देश है। आए दिन कोई-न-कोई पर्व मनाया जाता है। लेकिन सभी पर्व विभिन्न रूपों में बंटे हैं। कोई हिंदुओं का है तो कोई मुस्लिमों का। किसी को दक्षिण भारत में मनाया जाता है तो किसी को उत्तर भारत में। कोई आज मना रहा है तो कोई कल मनाने की तैयारी कर रहा है। चुनाव ही मात्र एक ऐसा पर्व है, जिसे सब मिलजुलकर हर्षो-उल्लास से मनाते हैं। पूरी दुनिया में पर्वों को हर साल मनाए जाने की परंपरा है। लेकिन चुनाव पर्व पांच साल में एक बार मनाया जाता है। ऐसा क्यों होता है, यह मेरी समझ से बाहर है। हम परंपरावादी लोग हैं। परंपराओं की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। चुनाव पर्व भी हर साल मनाया जाना चाहिए। पांच साल में नेता ही नहीं, जनता भी भूल जाती है कि किसने क्या वायदा किया था? जीतने और हारने वाले दोनों ही जनता से पांच साल के लिए मुंह मोड़ लेते हैं। इससे देश का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। न गरीबी दूर हो पा रही और न ही बेरोजगारी। दलितों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में भी कमी नहीं आ पा रही है। अपराध और भ्रष्टाचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। भले ही हम पर्ववादी हैं, लेकिन जब भी कोई पर्व आता है तो महंगाई का रोना रोने लगते हैं। महीने के खर्चे में कतर-ब्यौंत कर जैसे-तैसे पर्व को निपटाते हैं। लेकिन चुनाव पर्व में जनता का एक पैसा भी खर्च नहीं होता। खाने-पीने से लेकर घूमने-फिरने तक सभी का इंतजाम नेताजी कर रहे हैं। पोस्टर छपवाने-चिपकाने, होर्डिंग लगवाने और चुनाव प्रचार करने में बहुत से लोगों को लगाया जा रहा है। वेबसाइट बनवाई जा रही है। कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन बेरोजगारों को रोजगार मिल गया है। कच्ची दारू और अवैध हथियार जैसे कुटीर उद्योग को बढ़ावा मिल रहा है। नेता एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी और पोस्टरबाजी कर अच्छी-खासी नौटंकी कर रहे हैं। इससे मुफ्त का मनोरंजन हो रहा है। देश के कर्णधारों का विवेक जाग उठा है। वे अंतरात्मा की पुकार सुनने लगे हैं। गठबंधन बनने और टूटने लगे हैं। हाथ थामने वाले हाथ झटकने का दौर शुरू हो गया है। कई वर्षों तक साथ रहने वालों को भी कमल में किचड़ दिखाई देने लगा है। किसी को साइकिल में पंक्चर होने का डर सताने लगा है तो कोई हाथी से कूद कर नई सवारी ढूंढ रहा है। देश के कर्णधारों को समाजवाद, भ्रष्टाचार, धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे याद आने लगे हैं। झुग्गी-झोपड़ी से लेकर किसानों-मजदूरों की चिंता सताने लगी है। बेरोजगारी, गिरते जीवन स्तर, दलितों पर हो रहे अत्याचार, सत्ता में महिलाओं की भागेदारी आदि पर मंथन होने लगा है। कल तक जिनकी कब्र खोदने की कसमें खाई जा रही थीं, आज उन्हें शिखर पर पहुंचाने का दम भरा रहा है। जिनके साथ जिंदगी बिता दी, अब उनमें खोट दिखाई देने लगा है। अब पता चल रहा है कि जिस पार्टी के दस साल से पदाधिकारी थे, वह तो धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाए सांप्रदायिक पार्टी है। देश के कर्णधारों में विनम्रता आ गई है। पहले बार-बार जाकर भी नहीं मिलने वाले नेता, दर-दर पर जाकर मत्था टेकने लगे हैं। एक-से-एक लुभवाने वायदे किए जा रहे हैं। जिन्होंने जिंदगी में खाट तक नहीं देखी थी, वे झोपड़ी में रात गुजारने लगे हैं। समाजवाद की याद आने लगी है। रिक्शे में बैठकर फिल्म देखने जा रहे हैं। कोई फोन लगवाने और बैंक खाते खुलवाने का विश्वास दिला रहा है तो कोई आम आदमी के बढ़ते कदमों से देश को बुलंदी पर पहुंचाना चाहता है। आम आदमी, जनसेवा जैसे शब्द हर नेता की जबान पर आ गए हैं। लगता है, चुनाव के बाद देश में रामराज आ जाएगा। हर ओर सुख ही सुख होगा। अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को मुख्यधारा से जोडऩा एक बड़ी समस्या है। ये लोग पुलिस प्रशासन के लिए सिरदर्द बने रहते हैं। सरकार हर तरह के कदम उठाती है। फिर भी सफलता का प्रतिशत लगभग शून्य रहता है। लेकिन चुनाव पर्व में भाग लेने के लिए डाकू भी संत बन गए हैं। बात-बात पर पिस्टल तानने वाले बत्तीसी दिखा रहे हैं। जो काम सरकार भी नहीं कर सकी, उसे चुनाव पर्व ने बिना किसी प्रयास के कर दिखाया है। अब तक अपराधी किस्म के न जाने कितने लोग चुनाव पर्व में कामयाब होकर मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। जिस पर्व के इतने लाभ हो, वह हर वर्ष क्यों नहीं मनाया जाना चाहिए।
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