Saturday, 27 June 2009

पर्यावरण बचाओ, जीवन बचाओ

अप्रैल के अंत में ही सूरज ने अपनी तपीश से सभी को झुलसा दिया। पारे में हुई वृद्धि ने पचास साल पुराना रिकोर्ड तोड़ दिया। इसका प्रमुख कारण है-ग्लोबल वार्मिंग। इसने दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ग्लोबिल वार्मिंग है क्या ? पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को ही ग्लोबल वार्मिग कहते हैं। तापमान में बढ़ोत्तरी की सिलसिला 20वीं शताब्दी के आरंभ से ही शुरू हो गया था। वैज्ञानिकों के अनुसार सौ साल में पृथ्वी के तापमान में 0.18 डिग्री की वृद्धि हो चुकी है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि यदि धरती का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक 1.1-6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ़ जाएगा।
ग्लोबल वार्मिंग काफी हद तक मानव निर्मित समस्या है। पृथ्वी पर कई ऐसे केमिकल कम्पाउंड पाए जाते हैं, जो तापमान को बैलेंस करते हैं। ये ग्रीन हाउस गैसेज कहलाते हैं। ये प्राकृतिक और मानव निर्मित यानी कल-कारखानों से निकले दोनों प्रकार के होते है। ये वाटर वेपर, मिथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि हैं। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पडती हैं, तो इनमें से कुछ किरणें (इंफ्रारेड रेज) वापस लौट जाती हैं। ग्रीन हाउस गैसें इंफ्रारेड रेज को सोख लेती हैं और वातावरण में हीट बढ़ाती हैं। यदि ग्रीन हाउस गैस की मात्रा स्थिर रहती है तो सूर्य से पृथ्वी पर पहुंचने वाली किरणें और पृथ्वी से वापस स्पेस में पहुंचने वाली किरणों में बैलेंस बना रहता है। इससे तापमान भी स्थिर रहता है। मानव द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैस असंतुलन पैदा कर रही हैं। इसका असर पृथ्वी के तापमान पर पड़ रहा है। यही ग्रीन हाउस इफेक्ट कहलाता है।
कल-कारखानों, बिजली उत्पादन आदि में फॉसिल फ्यूल (कोल, पेट्रोलियम) के जलने के कारण कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है। कोयला खदान की खुदाई, तेल की खोज से मिथेन गैस पैदा होती है। इनके साथ ही, नाइट्रोजन फर्टिलाइजर से नाइट्रस ऑक्साइड बनता है। हाइड्रो-फ्लोरोकार्बन, परफ्लोरोकार्बन, सल्फर हेक्सा-फ्लोराइड आदि गैसें आधुनिक कल-कारखानों से निकले कचरे से पैदा होती हैं। ये सब ग्रीनहाउस के स्रोत हैं।
ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव हमारे जीवन तथा आस-पास के वातावरण पर भी पड़ रहा है। समुद्री जलस्तर का बढ़ना, ग्लेशियर का पिघलना, उत्तरी ध्रुवों का सिकुड़ना आदि ग्लोबल वार्मिग के लक्षण हैं। इसके अलावा, मौसम में बदलाव, ऋतुओं में परिवर्तन भी ग्लोबल वार्मिग की वजह से ही हो रहे हैं। इनके अलावा समुद्री तूफान जैसी आपदाएं आएंगी और गर्म वातावरण में पनपने वाले जीवाणु बढ़ेंगे और लोगों में तरह-तरह की बीमारियां फैलेंगी।यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि आगे चलकर खेती ही चैपट हो जाए या इन परिस्थितियों से जूझने के लिए खेती के मौसम, बीजों के चुनाव जैसे दूसरे कामों में आमूल परिवर्तन करना पडे़। उसके पहले भी हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि खाद्य पदार्थों की पैदावार में भारी कमी के कारण भुखमरी फैल जाए।
ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने के लिए प्रकृति को बचाना होगा। सौर ऊर्जा का भरपूर उपयोग करना होगा। पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता के लिए विकसित देशों को अंधाधुंध औद्योगीकरण की राह छोड़नी होगी। विश्व में कार्बन विरोधी मुहिम चल रही है। भारत में कोयला व लकड़ी ईधन के बजाए वैकल्पिक ऊर्जा और ईधन के स्त्रोत ढूंढे जाएं। इसका सबसे बेहतर विकल्प सौर ऊर्जा है। इसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए। तटीय इलाकों में पवन ऊर्जा बेहतर विकल्प है। प्राकृतिक और वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों का घरेलू ईधन के तौर पर इस्तेमाल मानवीय स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकारी होगा।
एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग से बड़ी संख्या में लोग एलर्जी का शिकार हो रहे हैं। वल्र्ड एलर्जी आर्गनाइजेशन ‘डब्ल्यूएओ’ के मुताबिक एलर्जी 21वीं सदी की तेजी से उभरती बीमारी के रूप में सामने आ रही है। इससे अस्थम, दमा, और राइनाइटिस, नाक के अंदरूनी हिस्से में जलन, जैसी बीमारियों में भी वृद्धि हो सकती है। एक आकडे़ के अनुसार पूरी दुनिया में हर साल ढाई लाख लोग दमा से मर जाते हैं।
पर्यावरण और जीवन एक सिक्के के दो पहलू हैं। धरती में जीवन तभी बरकरार रहेगा जब पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी लोगों को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे। अधिक से अधिक भूमि पर पौधे लगाकर ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
कुछ प्रयास
अर्थ आर
ग्लोबल वार्मिंग की समस्या की गंभीरता को देखते हुए विश्व के विभिन्न हिस्सों में रह रहे लोगों में जागरूकता आई है। वे इस समस्या से निपटने के लिए अपने-अपने तरीके से हर संभव प्रयास कर रहे हैं। ऐसा ही प्रयास हुआ अर्थ आर के रूप में। सन् 2007 में पहली बार सिडनी के बीस लाख से अधिक लोगों ने एक घंटे के लिए लाइट बंद रखी। इस अभियान हो नाम दिया गया- अर्थ आर -‘मंतजी ीवनत’। सन् 2008 में 35 देशों के करीब एक करोड़ लोगों ने इसमें भाग लिया और इस प्रकार यह अभियान सिडनी से पूरी दुनिया में फैल गया। सन् 2009 में यह अभियान 28 मार्च को मनाया गया। रात साढ़े आठ बजे से लेकर साढ़े नौ बजे तक लाइट बंद रखी गई। इसमें भारत सहित 75 देशों की 1000 शहरों में रहने वाले एक अरब लोगों ने भाग लिया। एक अनुमान के अनुसार यदि एक अरब लोग एक घंटा लाइट बंद रखते हैं तो करीब 60000 मेगावाट बिजली की बचत होती है। उम्मीद है कि आने वाले समय हर देश के नागरिक अभियान में भागेदारी कर महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
मैती- दहेज नहीं पेड लगाओ
आधुनिक विकास के लिए प्राकृति संपदाओं का अंधाधंुध दोहन हुआ है। पहाड़ से पेडों की कटाई भी बड़ी मात्रा में हुई। इससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ा है। इसके दुष्परिणाम ग्लेशियरों के पिघलने आदि के रूप में सामने आ रहे हैं। पर्यावरण की रक्षा के लिए पहाड़ों को हराभरा करना बेहद जरूरी है। इसकी तहत गढ़वाल मंडल में शुरू हुआ मैती नामक रचनात्मक आंदोलन। पेडों की रक्षा के लिए जगह-जगह मैती संगठन बनाए गए हैं। जब किसी लड़की की शादी होती है तो उसके बताए स्थान पर दूल्हा पेड लगाता है। पेड की देखभाल के लिए वह संगठन को कुछ पैसे देता है। यह पैसा गांव के जरूरतमंद लोगों को दे दिया जाता है और वे पेड़ की रक्षा करते हैं। इससे दुल्हन पर्यावरण की रक्षा होती है और दुल्हन का मायके से भावनात्मक संबंध बना रहता है। यदि प्रत्येक शादी में इस परंपरा को अपनाया जाए तो विश्व को पर्यावरण संकट से उबारा जा सकता है।