Friday, 10 April 2009

कुर्सी पुराण

यह संसार नश्वर है। रिश्ते-नाते मायाजाल है। एक दिन सब यहीं छूट जाएगा। कौन किसके साथ आया था और कौन साथ जाएगा? इसलिए किसी बंधन के मोहपाश में मत फंस। काट दे सभी को। एक दिन सब कुछ नष्ट हो जाएगा। इस संसार में यदि कुछ सारस्वत है, तो वह है कुर्सी। यह कल थी, आज है और कल भी रहेगी। इसे पाने के लिए ही हर कोई तडफ़ता है। अच्छा-बुरा जो भी करता है, वह सब इसके लिए करता है। कुर्सी में ऐसा जादू है, जो इस पर विराजता है वह पवित्र हो जाता है। उसके सारे दोष गुण में बदल जाते हैं। उसकी कमियां भी अच्छाई लगने लगती हैं। उसकी मूर्खताओं में विद्वता ढूंढी जाती है। उसे याद रखा जाता है। लक्ष्मी और सरस्वती में भले ही बैर हो, लेकिन कुर्सी की बदौलत दोनों सध जाती हैं। इतिहास गवाह है कि अनपढ़ और जाहिल कुर्सीवानों के यहां भी विद्वान सजदा करते हैं। उसकी कृपा पाने के लिए तरसते हैं। एक बात और जो जितने तिकड़म और जोड़तोड़ से कुर्सी प्राप्त करता है, इतिहास उसे उतना ही अधिक स्थान देता है। कुर्सी मुर्दे में भी जान फूंक देती है। बुढ़ापे में सूखे गालों में भी हरियाली आ जाती है। वह घोड़े सा सरपट दौडऩे लगता है। यह याद रख कुर्सी आदमी के लिए नहीं, बल्कि आदमी कुर्सी के लिए बना है। इसलिए खुद को कुर्सी से बड़ा मत समझ। जीना उसका जीना है, जिसने कुर्सी पा ली। अर्जुन की तरह आंख बस इसी पर टिका। तभी विजयश्री हासिल हो सकती है। ठीक किया जो वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ दिया। यह भी अच्छा किया जो रिश्तों को लात मार दी। भाई-बहन, जीजा-साला, बापा-बेटा यह कोरी भावुकता है। क्या रखा है इसमें? पौराणिक काल से आज तक सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे कि कुर्सी के लिए बेटे ने बाप को बाप नहीं समझा और भाई को भाई। कुर्सी के लिए पहला विद्रोह घर से ही होता है। और फिर न तो शरीर तुम्हारा है और न ही तुम इसके हो। शरीर पंच तत्वों आग, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से बना है। एक दिन यह शरीर इन्हीं पंच तत्वों में विलीन हो जाएगा। सब नाते-रिश्ते इस नश्वर शरीर से ही तो हैं। फिर उनका कैसा मोह? संसार परिवर्तनशील है। हर पल कुछ-न-कुछ बदलता रहता है। ऐसे में सिद्धांत और नैतिकता की बात करना बेइमानी है। ये सब भी बदलते रहते हैं। जीतता वही है जिसकी निगाह भविष्य पर टिकी हो। और भविष्य है कुर्सी। कुर्सी मिल जाएगी तो नाश्ते-रिश्तेदारों और बंधु-बांधव गुड़ पर चींटे की तरह खींचे आएंगे। जो कुर्सी प्राप्त नहीं कर पाएगा, उसे कम से कम पांच साल तक इंतजार करना पडग़ा। जो आज गले लगा रहे हैं, वह भी दुत्कार देंगे। फिर खुजलाए कुत्ते की तरह फिरते रहो गली-गली। क्यों व्यर्थ चिंता करे हो? तुम क्यों भयभीत हो रहे हो? जो हुआ वह अच्छे के लिए हुआ, जो हो रहा है वह अच्छे के लिए हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छे के लिए होगा। दुनिया के रंगमंच में हम सभी कठपुतली हैं, जिसकी डोर नियति के हाथ में है। हम कुछ नहीं करते। जो होना होता है, वह होता है। भूत के लिए पश्चाताप मत कर, भविष्य के लिए चिंतित मत हो, केवल कुर्सी पर ध्यान रखो। यह संसार रणक्षेत्र है। युद्ध और प्रेम मेंं सब कुछ जायज है। याद रखो, वीर ही राज करता है और हर सुख भोगता है। बिना लड़े कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। बस चुनाव जीत। चाहे फर्जी मतदान करना पड़े। साम दाम दंढ भेद चाहे जिसका इस्तेमाल करना पड़े। जैसे भी हो कुर्सी प्राप्त कर। इसे ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना। इस जगत मेें जो कुछ भौतिक और आध्यात्मिक है, सब ब्रह्ममय है। कुर्सी प्राप्त करना भी ब्रह्ममय होना ही है। इस दुनिया में स्वर्ग के सुख भागने का सबसे सरल मार्ग कुर्सी है। कुर्सी मिल गई तो समझो यह जहां मिल गया। इसलिए हे वीर! सोच-विचार में समय नष्ट मत कर। यह मत सोच कि सामने भाई है या भतीजा, जीजा है या साला। तेरा मकसद सिर्फ सीट जीतना है। मन की सभी दुविधाओं को निकाल दे। मायाजाल में मत फंस। कहीं ऐसा न हो कि पांच साल तक पछताना पड़े।

1 comment:

BIJAY MISHRA said...

MAI BINA PADHE LEKHAK BANUNGA. KHAIR AAP BEHTAR LEKHAK HAI KEYOKI AAP NE PAHLE KAFFI PADHAIO KI HAI